शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

आखिर, बलात्कार की सजा क्या ​हो?

चंदा बारगल/ धूप-छांव/ दिल्ली में मेडिकल की छात्रा के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार की घटना ने जनपथ से लेकर राजपथ तक—सबको हिलाकर रख दिया है। बलात्कार के बाद युवती को चालू बस से जिस प्रकार फेंका गया, उसे सुनकर पत्थरदिल लोगों की रूह भी कांप जाए।

ऐसे नराधमों को सार्वजनिक रूप से फांसी दी जाना चाहिए, यह मांग दिल्ली, भोपाल, इंदौर सहित देश भर के शहरों—कस्बों से उठी है। यह स्वाभाविक भी है। बलात्कार की घटना के विरोध में सड़कों पर उतरे जन—समुदाय, खास तौर पर युवा पीढ़ी के चेहरे पर आक्रोश, व्यथा स्पष्ट दिखती है। इन तमाम लोगों की एक ही मांग है कि बलात्कारियों को फांसी दो!

लोगों का रोष स्वाभाविक भी है पर एक हकीकत यह भी है कि हमारे देश में बलात्कार के मामले में फांसी का प्रावधान नहीं है। इसके अलावा एक हकीकत यह भी है कि दिल्ली में जो घटना घटित हुई, वह केवल बलात्कार की घटना ही नहीं, एक शैतानी कृत्य भी है। हमारे यहां भले ही बलात्कार के मामले में फांसी की सजा का प्रावधान न हो, किंतु यदि ऐसे मामले में पुलिस यदि मजबूत केस तैयार करती है तो न्यायाधीश फांसी की सजा सुना सकते हैं।

भारत में अंतिम फांसी मुंबई के आतंकी हमले के आरोपी अजमल कसाब को दी गई थी। कसाब के पहले 2004 में पश्चिम बंगाल की अलीपोर जेल में धनंजय चटर्जी नामक आरोपी को फांसी की सजा दी गई थी। धनंजय पर एक बच्ची के साथ बलात्कार करने के उसकी हत्या का आरोप था। सवाल यह भी है कि जब धनंजय चटर्जी को बलात्कार—हत्या के मामले में फांसी हो सकती है तो फिर दिल्ली के गेंगरेप के मामले के आरोपियों को क्यों नहीं?

इन तमाम सवालों से महत्वपूर्ण एक सवाल यह भी है कि बलात्कार के आरोपी को ​सजा क्या होना चाहिए? क्या सजा दी जाए, जिससे पीड़ित बच्ची, किशोरी या युवती को न्याय मिले? यह सवाल लोगों से पूछा गया तो उनका जवाब था कि चाहे जो सजा दी जाए, वह कम ही है।

बलात्कार, स्त्री की गरिमा, मानवीय संस्कार और सामाजिक व्यवस्था का अपमान है। बलात्कार की पीड़ित युवती को शारीरिक यातना से अधिक जो मानसिक आघात होता है, वह उसे ताजिंदगी चैन नहीं लेने देता। उसमें जीने की चाह खत्म हो जाती है और पुरुष नाम से ही नफरत हो जाती है। वह एक घटना हर रोज उसका मानसिक बलात्कार करती है। ऐसे में वह जीते—जी नरक भोगने को मजबूर हो जाती है, इसलिए हमारे यहां हत्यारे के मुकाबले बलात्कारी को अधिक नीच, हलकट समझा जाता है। जेलों में भी खूंख्वार से खूंख्वार अपराधी भी बलात्कार के आरोपी को अछूत मानते हैं और कई मर्तबा जेलों में बलात्कार के आरोपियों के पिटाई तक की जाती है।

दिल्ली के गेंगरेप की घटना के बाद लोगों के गुस्से के मद्देनजर सरकार ने बलात्कार की सजा पर पुनर्विचार करने के लिए तीन सदस्यीय विधि—विशेषज्ञों की समिति गठित की है। इस समिति को एक माह में अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश करने को कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा की अध्यक्षता में गठित इस समिति में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ और पूर्व सालिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम हैं। देखना यह होगा कि यह समिति क्या सिफारिश करती है?

समय के साथ अब सजा की क्रूरता भी घटा दी गई है। पहले के जमाने में बलात्कार को सबसे गंभीर अपराध माना जाता था और क्रूरतम सजा दी जाती थी। अफगानिस्तान में बलात्कार के आरोपी को पहाड़ पर से घाटी में धकेल दिया जाता था या उसे दीवार में चुन दिया जाता। उत्तर अमेरिका में पुरुष के अंग पर इलेक्ट्रिक शॉक दिया जाता और उसकी फिल्म लोगों को दिखाई जाती थी ताकि कोई ऐसा गुनाह करने की हिम्मत न जुटा सके। ईराक में शरिया कानून के अनुसार मृत्युदंड दिया जाता था तो फिलीपींस में विषैला इंजेक्शन देकर अपराधी को मौत की नींद सुला दिया जाता।

सउदी अरब में बलात्कारी को 2600 कोड़े और पांच साल की सजा का प्रावधान है। कोड़े की सजा भी एक बार में नहीं बल्कि 50—50 दिनों के अंतराल में दी जाती जिससे वह पांच साल यातना भोगता। सूडान में भी बलात्कार की सजा मौत है। वहां तो शादी के पहले भावी पत्नी के साथ संसर्ग भी एक गुनाह माना जाता है और पार्टनर के सामने ही सौ कोड़े मारने की सजा सुनाई जाती है।

अनेक देशों में तो 'रेप' यानी बलात्कार शब्द के इस्तेमाल पर ही रोक है। ऐसे कृत्य को सेक्सुअल एसॉल्ट सानी शारीरिक हमला कहा जाता है। केनेडा और दूसरे देशों में यह प्रावधान है। फ्रांस की बात करें तो वहां बलात्कार की अधिकतम सजा 15 वर्ष है।

यदि पीड़ित की मौत हो जाती है तो 30 साल  और बलात्कार के वक्त क्रूरता बरती जाती है तो आजीवन कारावास की सजा दी जाती है। न्यूजीलेंड, जापान, नार्वे, आस्ट्रेलिया, यूएसए, रशिया, साउथ कोरिया और डेनमार्क में पांच से 15 वर्ष की सजा दी जाती है।

अनेक देशों में नाबालिग के साथ बलात्कार की सजा अधिक है तो कुछ रूढ़िवादी देशों में विवाहिता स्त्री के साथ बलात्कार को अधिक हीन कृत्य माना जाता है। कुछ देशों में बलात्कार की पीड़ित युवती के साथ शादी करवाई जाती है। इस सजा का दुरुपयोग इस प्रकार होने लगा कि जिसके साथ शादी करने की इच्छा होती उसके साथ बलात्कार कर दिया जाता, इसलिए यह सजा निरस्त कर दी गई। पुराने समय में तो पीड़ित युवती से पूछा जाता कि तुम बताओ इसे क्या सजा दी जाए?

सभी देशों में अलग—अलग सजा है। हमारे लिए महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हमारे यहां सजा क्या होना चाहिए। इसके अलावा, हमारे यहां बलात्कार का प्रकरण चलाने की पद्धति विच़ित्र और पीड़ादायक है। अदालत में जिस प्रकार सवाल—जवाब होते हैं और फैसले में विलंब होता है, वह भी ठीक नहीं है। हमारे यहां कड़ी सजा के प्रावधान के अलावा तयशुदा दिनों में ही फास्ट ट्रेक कोर्ट में सुनवाई होकर निर्णय दिए जाने की आवश्यकता थी।

बलात्कार के मामले में कड़ी सजा के सामने एक दलील यह भी है कि बलात्कार के अनेक मामले सच्चे नहीं होते। एक वाहियात दलील यह भी दी जाती है कि महिला की मर्जी के विरुद्ध बलात्कार हो ही नहीं सकता। कई मामलों में पुरुष को ब्लेकमेल करने के लिए बलात्कार की शिकायत होती हैं। कुछ मामलों में युवती या महिला पकड़े जाने के बाद अपना दोष छुपाने के लिए बलात्कार के आरोप होते हैं। कई बार हम पढ़ते हैं या सुनते हैं कि सतत् एक माह तक बलात्कार किया गया या छह माह तक घर में बंधक बना कर दुष्कृत्य किया गया, ऐसे ​मामलों में भी शंका होती है।

इसका मतलब यह कदापि नहीं कि सारे ही मामले झूठे या बनावटी होते हैं। इसके अलावा न्यायतंत्र की धुरी संभालने वाले न्यायाधीश भी विद्वान होते हैं। वे अच्छी तरह समझ सकते हैं कि घटना सच्ची है या झूठी है।
हमारे यहां बलात्कार और खासतौर पर गेंग रेप की जो बाढ़ आई है, उसमें कमसिन बच्चियां और किशोरियां अधिक शिकार बन रही हैं। सामान्य बलात्कार को एक तरफ रख दें तो ऐसे मामलों कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए।

एक दलील यह भी है कि केवल कानून बना देने से जुर्म रूकते नहीं हैं। ऐसा भले ही कहा जाता हो पर कड़ी सजा का प्रावधान हो तो अपराधी ऐसा दुष्कृत्य करने से डरता तो है। साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाए जाने की भी आवश्यकता है, ताकि उन्हें अपने सुरक्षित होने की गारंटी का एहसास हो।

भारत का जिक्र निकलता है, तब पूरी दुनिया यह कहती है कि हमारा देश सुपर पॉवर बनने की ओर अग्रसर है। यदि हम सुपर पॉवर बन भी जाते हैं और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति लापरवाह बने रहे तो कहीं भी सिर उठाकर नहीं घूम सकते। देखना होगा कि मासांत में न्यायाधीशों की समिति अपनी जो रिपोर्ट पेश करने वाली है उसमें कितनी कड़ी सजा की सिफारिश करती है। खैर, सजा ऐसी होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति महिलाओं पर बुरी नजर डालने का दुस्साहस भी न कर सके।

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