बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

मेरे पसंदीदा शायर-1 शहरयार: शायरी का 'यार'

उर्दू के मशहूर शायर शहरयार यानी कुंवर अखलाक मोहम्मद खान को हयात से जाए एक बरस हो गया, किंतु ऐसा लगता है, जैसे वे अभी जिंदा हैं। 'उमराव जान', 'गमन' और 'आहिस्ता—आहिस्ता' जैसी फिल्मों के लिए लिखी गईं, उनकी गजलें, आज भी बरबस होंठों पर आ जाती हैं। उर्दू साहित्य के फिराख गोरखपुरी, कुर्तुल ऐन हैदर और अली सरदार जाफरी के बाद ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित होने वाले चौथे शायर थे।

शहरयार का जन्म उत्तरप्रदेश के बरेली जिले के आंवला गांव में 16 जून 1936 को हुआ था और पिछले साल 13 फरवरी को उन्होंने हयात से बिदा ले ली थी। शहरयार का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जिसका शायरी से दूर-दूर तक का नाता नहीं था। दीगर उर्दू शायरों जैसी शायरी की परंपरा नही थी। उनके परिजनों-रिश्तेदारों में ज्यादातर सेना में या पुलिस में थे। 

भाई पुलिस में इंस्पेक्टर होने के कारण, उनके पिताजी को लगता था कि वह पुलिस इंस्पेक्टर बने। शहरयार हॉकी खिलाड़ी होने के साथ ही एथलीट भी थे। उनके वालिद को लगता था कि शहरयार पुलिस या सेना के लिए पात्र हैं, लेकिन शहरयार पिताजी की सोच से इत्तिफाक नहीं रखते थे। लिहाजा, दोनों में मतभेद बढ़ते चले गए। वालिद और घर वालों के खिलाफ बगावत शहरयार 1955 में अपने शायर मित्र खलीलुर्रहमान आजमी के पास रहने चले गए। उन्होंने ही शहरयार की आगे की प​रवरिश की। खलीलुर्रहमान आजमी की संगत में आने के बाद ही शहरयार को शायरी का चस्का लगा और धीरे—धीरे वे शायरी की ओर प्रवृत्त हो गए। 

शहरयार, एक ऐसे शायर थे, जो एक ही समय में प्राचीन काव्य परंपरा व आधुनिक जदीद उर्दू शायरी की परंपरा से समन्वय साधते। उनकी गजलों में पारंपरिक शब्दावली व शैली, प्रतीक चिह्न दिखते हैं, वैसी ही कल्पना एवं विचारों में आधुनिकता दिखाई पड़ती है। इसी कारण, राही मासूम रजा जैसे गीतकार व शायर उन्हें 'नज्मों का शायर' मानते थे। इसी तालमेल के कुछ शेर देखिए—

'ये क्या हुआ कि खामोशी भी गुनगुनाने लगी,
गयी सतों की हर इक बात याद आने लगी।'
'बुरा कहो कि भला समझो यह हकीकत है,
जो बात पहले रूलाती थी, अब हंसाने लगी।'
'तेरे आने की खबर आते ही डर लगने लगा,
गैर का लगता था जो वो अपना घर लगने लगा।'
खलीलुर्रहमान आजमी, आधुनिक उर्दू शायरी के माने हुए शायर थे। उनकी राय में शहरयार नज्म और कविता दोनों के शायर थे। हकीकत में देखें तो फैज अहमद फैज की तरह शहरयार भी गजल व नज्म के शायर माने जाते थे। पहली कदीम यानी पारंपरिक शायरी के बाद उर्दू शायरी में तीन पड़ाव आए। पहली प्रगतिशील शायरी, दूसरी जदीद यानी आधुनिक शायरी और माबाद जदीद यानी आधुनिकोत्तर। 1930 से 1960 का कालखंड प्रगतिशील काल, 1960 से 1985 जदीद शायरी का काल और 1985 के बाद का माबाद जदीद शायरी का काल माना जाता है। शायरी के इन तीनों प्रकारों पर शहरयार ने एक जगह कहा है, 'मैं साहित्य की हर विधा का समान करता हूं।' यह जरूरी भी है, क्योंकि हरेक की अपनी नई विचारधारा होती है। उसे गंभीरतापूर्वक और गहराई से देखने की जरूरत होती है। साहित्य में ऐसे बदलाव समीक्षात्मक स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। प्रगतिशील उर्दू शायरी अल्लामा इकबाल व उनके समकालीनों से बहुत अलग नहीं थी, पर उसे परखने के, जो मापदंड थे, वे थोड़े भिन्न थे। इन्हीं के आधार पर नया साहित्य लिखा गया। उसमें अच्छे-बुरे दोनों का समावेश था। बाद में फिर बदलाव की गरज महसूस हुई और फिर जदीद शायरी सामने आई। शहरयार को जदीद शायर माना गया। वे खुद के बारे में कहते थे-'मेरी शायरी में सामाजिक जुड़ाव होने के कारण मुझे आधुनिक शायर माना जाता है। पारंपरिक गजल दिनों-दिन अपनी शब्द-संपदा बदलती रहती है। अपनत्व, भावना भी बदलती रहती है और स्वाभाविक भी है। इसी कारण वह उत्तरोत्तर आधुनिक व समकालीन बनती है।' शहरयार की गजल, उसकी तरल अभिव्यक्ति, अंतकरण की थाह लेने वाली शब्द रचना और मनमोहक प्रतीक, रूपक, उपमा के कारण लोकप्रिय हुई हैं—

'ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन-सा दयार है,
हद-ए-निगाह तक जहां, गुबार ही गुबार हैं।'
'जुस्तजू जिसकी  थी उस को तो न पाया हमने,
इस बहाने से मगर दुनिया देख ली हमने।'
'सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है,
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।'
'अजीब सानिहा मुझ पर गुजर गया यारो,
मैं अपने ही साये से कल रात डर गया यारो।'
इसलिए शहरयार की गजलें साहिर की तरह सुरों से अधिक श्ब्द व आशय के कारण जेहन तक पहुंचती हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार कमलेश्वर कहते थे,' मैं शहरयार को पढ़ता हूं, तब बहुत रूक—रूक कर पढ़ना पड़ता है। यह रूकना नहीं, स्टॉप नहीं। यहां विचारों को थपथपाना पड़ता है, विचार करने के लिए, सोचने के लिए। पटाखेबाज आतिशबाजी से दूर उनकी शायरी सुसंस्कृत है। इसी कारण शायद उनकी गजलों में हमेशा सांस्कृतिक प्रतिमा साकार होती है। उनकी शायरी का सफर यानी उन वृषों का सफर नहीं, जो सफर में झटपट पीछे छूट जाते हैं। यह सफर दूर तक साथ देने वाले वृक्षों का है। शहरयार की गजलों में एक आंतरिक निस्तब्धता है।' यही निस्तब्धता शहरयार को आगे के सवाल पूछने को प्रेरित करती है:

'बारहा पूछना चाहा, कभी हिम्मत न हुई,
दोस्तों रास तुम्हें आई, ये दुनिया कैसे?'

शहरयार के सभी शेर पढ़ने वालों को सोचने—विचार करने करने पर मजबूर करते हैं। उनकी गजलों में आत्मचिंतन है, सामाजिक एहसास भी है, इसलिए उनसे रूबरू होने वाले सवाल अनेक बार हमारे अपने मन के होते हैं। शहरयार खींच—तान कर सामाजिक आशय की गजलें लिखने के पचड़े में नहीं पड़ते। वह कहते थे,'शायरी दो प्रकार की होती है। एक वह जो गंभीर और सुंदर होती है। वह जग, देश व समाज की समस्या, भावना और स्थिति को मुखर करती है और दूसरी वह जो केवल मनोरंजन करती है। एक छापी जाती है तो दूसरी मुशायरे में सुनाई जाती है। यह स्पष्ट फर्क है। दूसरे प्रकार की शायरी के बारे में कोई भी राय व्यक्त करना ठीक नहीं, क्योंकि उर्दू में इन दोनों में इतना फर्क है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।'

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