गुरुवार, 22 नवंबर 2012

फांसी के पीछे किसका 'भेजा-फ्राय?'

चंदा बारगल/धूपछांव/ पाकिस्तान से आए खूंख्वार आंतकी अजमल कसाब को बुधवार सुबह फांसी दिए जाने की खबर दावानल की भांति फैली। खबर चकित कर देने वाली थी। आश्चर्य इसलिए अधिक था, क्योंकि कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के बारे में जो आम धारणा थी, यह खबर ठीक उलट थी।

अब तक आम लोगों को, खासकर कांग्रेस के विरोधियों को यही लगता था कि वोट बैंक के डर से यूपीए सरकार अजमल कसाब और अफजल गुरू को फांसी नहीं दे रही है। लोगों का यह भी खयाल था कि प्रधानम़ंत्री डॉ. मनमोहनसिंह एक कमजोर और नकारा प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री डॉ.सिंह और उनकी सरकार ने कसाब को फांसी पर लटकाकर इन दोनों धारणाओं को झूठा साबित कर दिया है।

गजब की गोपनीयता


आपरेशन एक्स, इसलिए भी अचरजभरा था, क्योंकि इसे आखिरी क्षणों तक प्रोफेशनल स्टाइल से गोपनीय रखा गया था। कुल 17 अधिकारियों को आपरेशन 'एक्स' कोडनेम में रखा गया था और जब पूरा देश सोकर उठा ही था, तब तक कसाब का हिसाब चुकता हो चुका था। यह बात आखिरी क्षणों तक भारत के गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ही जानते थे। जिन 17 अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उनके मोबाइल फोन भी ले लिए गए थे। सामान्यत: इजराइल, अमेरिका या रूस में इस प्रकार के आपरेशन गोपनीय तौर पर किए जाते हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि इस आपरेशन की प्रक्रिया के बारे में मीडिया को पहले से वताया नहीं गया था और हर छोटी—बडी घटना को लाइव दिखाने और पहले दिखाने की होड़ करने वाला मीडिया भी आपरेशन एक्स की भनक तक सूंघने में नाकाम रहा। यदि मीडिया को पहले से इस बात की भनक भी लग जाती तो एमनेस्टी इंटरनेशनल से लेकर हृयूमन राइट्स की देश—दुनिया भर की संस्थाएं बवाल मचा देतीं।

करारा जवाब


कसाब को फांसी देने की घटना अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। एक तो अनेक सालों बाद भारत ने पाकिस्तान और उसके द्वारा पोषित आतंकवादियों को एक तगड़ा संदेश दिया है। यह ठीक वैसा ही संदेश था, जैसा इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में पाक के दो टुकड़े करवाकर बांग्लादेश का निर्माण करवा दिया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि भारत सरकार ने भारत में रह रहे आतंकवादी संगठनों के स्लीपर्स सेल और आतंकवाद के प्रति हमदर्दी रखने वाले तत्वों को भी करारा जवाब दिया है। तीसरी बात यह कि भारत की संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू को फांसी देने के पहले कसाब को फांसी देकर यह भावनात्मक संदेश भी दिया है कि सरकार को संसद सदस्यों से ज्यादा चिंता आम जनता की है। अब तक सारी सरकारें आतंकवादियों के प्रति नरम और उदार रवैया अपनाती थी।

एनडीए सरकार में तो जेल में बंद खतरनाक आतंकवादी को खास विमान में बैठाकर ठेठ कंदहार जाकर सौंप दिया गया था। इस विमान में विदेशमंत्री जसवंतसिंह भी गए थे। यूपीए सरकार के इस आपरेशन से भाजपा भी स्तब्ध है। देश की जनता आतंकवाद के कारण अब तक लाखों निर्दोष लोगों और बड़े नेताओं को गंवाया है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी आतंकवाद की बलि चढ़ चुके हैं। कसाब को फांसी देने के फैसले से इंदिरा गांधी द्वारा आधी रात को लिए जाने वाले फैसलों की याद ताजा कर दी। यह फैसला ऐसे वक्त लिया गया, जब अगले महीने गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस सरकार ने यह कदम चुनाव में फायदे की दृष्टि से से उठाया है। अमेरिका में बराक ओबामा की जीत के पीछे उनके द्वारा किया गया 'आपरेशन ओसामा बिन लादेन' भी एक निर्णायक घटक था। यहां कांग्रेस ने 'आपरेशन कसाब' द्वारा इसी युक्ति को दोहरा जाएगा, ऐसा लगता है।

आतंकवाद फ्रेंकेस्टाइन


आतंकवाद, तो आतंकवाद है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। भले ही वह मुस्लिम आतंकवाद हो या हिंदू आतंकवाद हो, खालिस्तानी आतंकवाद हो या तमिल चीतों का आतंकवाद हो। इजराइल, ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां आतंकवाद से सख्ती से निपटा गया है। इजराइल में लोकतंत्र है, परंतु वहां आतंकवाद के मुद्दे पर कोई राजनीति नहीं होती। अमेरिका ने पाकिस्तान की मांद में घुसकर ओसामा बिन लादेन का जिस प्रकार आपरेशन किया, ऐसे अनेक आपरेशन इजराइल कर चुका है।

बहरहाल, कांग्रेस के प्रति लोगों की परंपरागत धारणा—मान्यता के विरुद्ध कसाब को पूरी गोपनीयता के साथ फांसी देने के निर्णय के पीछे कांग्रेस के किसी चाणक्य का दिमाग काम कर गया। दिल्ली के सत्ता—साकेत में यह चर्चा भी है कि इस अहम् फैसले के पीछे सोनिया या राहुल गांधी के किसी अनुभवी सलाहकार की भूमिका हो सकती है, जिससे 2014 के आम चुनाव के पहले राहुल गांधी की इमेज उनकी दादी इंदिरा गांधी जैसी है,यह संदेश पूरे देश की जनता में पहुंचाया जाए। इस फैसले से 2014 के चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा होगा, यह तो समय ही बताएगा, मगर अब हमें मियाद पूर्व चुनाव नजदीक हैं यह मानकर चलने में कोई हर्ज नहीं।

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