रविवार, 2 दिसंबर 2012

गुजरात की चुनावी 'महाभारत'

महात्मा गांधी का गृह-राज्य गुजरात, विधानसभा चुनाव के लिए तैयार है। ठिठुराने वाली सर्दी शुरू होने में भले ही अभी वक्त हो पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने चुनावी गर्मी ला दी है। पहले के चुनावों के वक्त आखिरी समय तक सुस्त रहते थे पर इस बार का माहौल भिन्न है। फिलहाल, खेतों में गेहूं बोने का सीजन है परंतु गांवों में चौक-चौराहों पर किसान चुनावी गपशप में अधिक व्यस्त हैं। जगह-जगह पोस्टर-बैनर लग गए हैं। गांव-गांव में जीपें दौड़ रही हैं। राजनीतिज्ञ पहले से अधिक विनम्र हो गए हैं। लोगों के काम फटाफट निपट रहे हैं।


कल-कल तक एयर कंडीशंड में आराम फरमाने वाले मंत्री आज घर-घर जाकर हाथ जोड़ रहे हैं। जो विधायक पांच वर्ष से कार से नीचे उतरते नहीं थे, वे अब गली-गली पदयात्रा करने को मजबूर हैं। हालांकि, ये सब थोड़े दिनों के लिए ही है, चुनाव के बाद वे सब वापस पांच सालों के लिए गुम हो जाएंगे। 

ये पब्लिक है, ये सब जानती है...


लोग अब पहले से अधिक जागरूक हो गए है। किस विधायक ने ग्रांट देने के लिए कितने पैसे मांगे थे, यह लोगों को पता है। कौन विधायक मोबाइल ही नहीं उठाता है, लोग ये भी जानते हैं। कौन सा नेता पहले पैदल था और अब विधायक बनने के बाद 12—15 लाख की कार में घूम रहा है। कौन नेता किराए के मकान में रहता था और अब भव्य बंगले में रह रहा है। किस विधायक या नेता की ठेकेदारों या बिल्डर के साथ मिलीभगत है। लोगों को इस बात की भी खबर है कि किस विधायक ने अपने परिजनों या रिश्तेदारों के नाम से जमीन—जायदाद खरीदी है। 

जातिवाद जिंदाबाद


उल्लेखनीय बात यह है कि 2012 के चुनाव में 2002 जैसा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं है। इस बार के चुनाव में हिंदुत्व या अल्पसंख्यकवाद के बजाय जातिवाद का अधिक जोर है। भाजपा और कांग्रेस— दोनों प्रमुख पार्टियां इस बार जातीय समीकरणों के आधार पर चुनाव लड़ रही हैं। चुनाव के पहले किए गए वादे बाजू हो गए हैं और सत्ता हासिल करने के लिए टिकटों की खींचतान में जातिगत मतदाताओं के आधार पर ही उम्मीदवार तय किए गए। चुनाव के पहले भाजपा कांग्रेस के भ्रष्टाचार, गुजरात के अन्याय और गुजरात ​के विकास का मुद्दा उठा रही थी। इसी तरह, कांग्रेस भाजपा की मोदी सरकार के विकास के आंकड़ों के मायाजाल की पोल खोल रही थी। यह सब टिकट वितरण में हवा—हवाई हो गए। विचारधारा की बातें भी धरी रह गईं। भाजपा के जो लोग कल तक कांग्रेस को गाली देते थे, उनमें से कई कांग्रेस में आ गए और जो लोग कल तक भाजपा के खिलाफ विषवमन करते थे, उनमें से कितने ही रातों—रात भाजपा से जुड़ गए और टिकट भी ले आए। कांग्रेस और भाजपा—इन दोनों प्रमुख पार्टियों के बरसों पुराने निष्ठावान और स​मर्पित कार्यकर्ताओं का मानना है कि पार्टी के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी पर टिकट बांटते वक्त उनकी उपेक्षा ही हुई। मौजूदा राजनीति के दौर में हिंदूवाद, अल्पसंख्यकवाद, सांप्रदायिकतावाद, जातिवाद, पूंजीवाद जैसे अनेक शब्द प्रचलित हैं, किंतु एक शब्द बहुत कम प्रचलित होने के बावजूद अनेक कार्यकर्ताओं को उसका कडुवा अनुभव है। उसका नाम है—उपयोगितावाद यानी यूज एंड थ्रो। राजनीति में अनेक दिग्गज और वरिष्ठ नेता उनके कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल कर उनकी जरूरत न होने पर उन्हें फेंक देते हैं। कहावत भी है कि 'जंग और मुहब्बत में सब जायज है' चुनाव भी एक प्रकार से जंग ही है। 

धन-बल का खुल्लमखुल्ला 'खेल'


अब जब, गुजरात में चुनाव सामने है तो चुनाव आयोग चाहे जितनी गिद्ध—दृष्टि रखे, इसके बावजूद करोड़ों रूपए का 'खेल' होना है। ऐसा नहीं है कि केवल नेता ही अविश्वसनीय हैं, कई बार कार्यकर्ता और वोटर भी अविश्वसनीय हो जाते हैं। कितने ही कार्यकर्ता वोटरों को खींचने के नाम पर उम्मीदवार से लाखों रूपए ऐंठ लेते हैं और उस पैसे को घर की तिजोरी में रख देते हैं। कई कार्यकर्ता मतदाताओं को खरीद भी लेते हैं। चुनाव के मौसम में वोटरों के साथ कार्यकर्ताओं की चल निकलती है। कोई किसी गांव में मंदिर निर्माण के लिए तो कोई जाति या संप्रदाय की धर्मशाला इत्यादि के लिए फंड देकर उस जाति के वोटरों को लुभाने की कोशिश करता है। शराब, साड़ी बांटने की तरकीब अब पुरानी हो चुकी है। अब मोबाइल फोन से लेकर मोटर सायकल तक बांटी जाती है। वोटरों को लुभाने के कई तरीके और युक्तियां हैं। कई मर्तबा वोटर भी ललचाते हैं। नेताओं को भ्रष्ट बताने वाला कोई वोटर जब पैसे लेकर वोट देता है तो वह भ्रष्ट बन जाता है। हालांकि, सभी वोटर लालची नहीं होते। समाज का बहुत बड़ा मतदाता वर्ग प्रामणिक और जागृत है। चुनाव के वक्त दारू अपना खेल नहीं दिखा पाए, इसलिए चुनाव आयोग के आदेश पर गुजरात की सीमाएं सील कर दी गई हैं। विभिन्न राज्यों को जोड़ने वाली सीमाओं पर पुलिस तैनात कर दी गई हैं, लेकिन शराब माफिया अधिक चालाक है। उन्होंने चुनाव की तारीख घोषित होने के पहले ही शराब का पर्याप्त स्टॉक पूरा दिया है। हां, एक बात सही है कि चुनाव आयोग की सख्ती के कारण अब पहले जैसी बूथ केप्चरिंग नहीं होती और अब अनेक सरकारी अधिकारी या पुलिस अधिकारी भी चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ दल की मदद करने से डरते हैं। भारत जैसे विशाल और विभिन्न धर्म और जाति वाले देश में चुनावी प्रक्रिया संपन्न कराना वाकई एक जटिल काम है परंतु चुनाव आयोग इस मुश्किल काम को बड़ी कुशलता से अंजाम देता है, यह भारत के लोकत़ंत्र के लिए गर्व की बात है।

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