बुधवार, 7 नवंबर 2012

राहुल गांधी: असली परीक्षा 2014 में

चंदा बारगल/ धूप-छांव / राहुल गांधी कौन हैं? यह अमूमन सभी जानते हैं, लेकिन राहुल गांधी की खासियत क्या है? राहुल गांधी के मन में क्या है? राहुल गांधी की कमजोरी क्या है? राहुल गांधी क्या करना चाहते हैं? राहुल गांधी क्या कर सकते हैं? क्या नहीं कर सकते हैं? राहुल गांधी का राजनीतिक और आर्थिक चिंतन क्या है? ऐसे अनेक सवालों का जवाब आसान नहीं है।

ये सवाल लाजिमी भी हैं, सामयिक भी हैं और प्रासंगिक भी। गांधी राजघराने का यह 42 वर्षीय उत्तराधिकारी 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे सशक्त है। भूतकाल में 'नेहरू के बाद कौन?' और 'इंदिरा गांधी के बाद कौन?' जैसे सवाल उठे थे और उनका जवाब था— कोई नहीं, कोई नहीं। सोनिया गांधी के उत्तराधिकारी के रूप में राहुल का नाम बहुत पहले तय हो चुका था। यह भी तय है कि लोकसभा चुनाव का प्रचार शुरू होने के पहले राहुल गांधी सत्ता या संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके होंगे।

राहुल गांधी पर कुछ ऐसे ही मकसद और संदर्भों के साथ वरिष्ठ और प्रख्यात पत्रकार आरती रामचंद्रन ने एक पुस्तक लिखी है, जिसका शीर्षक है—'डीकोडिंग राहुल गांधी।' राहुल गांधी की शख्सीयत और उनकी अच्छे—बुरे दोनों पक्षों की पडताल का कदाचित यह पहला प्रयास है। शायद भी भारतीय राजनीति के इतिहास में राहुल गांधी ऐसे पहले नेता हैं, जो सत्ता के केंद्र में आने के पहले गहन अभ्यास का विषय बने हैं। यह मौका भी शायद राहुल ने ही लोगों को दिया है। नाम के पीछे 'गांधी'लिखा है, इसलिए कोई परीक्षा देने की जरूरत नहीं है, ऐसे भ्रम से राहुल गांधी फिलहाल मुक्त दिखाई पडते हैं।

'डीकोडिंग राहुल गांधी'सामयिक और प्रासंगिक किताब है। आरती रामचंद्रन के मुताबिक, राहुल गांधी एकाकी, एकांत—पसंद और संकोची स्वभाव के हैं। वे किसी के साथ खुलकर बातें नहीं करते। मीडिया को तो वे बहुत ही कम इंटरव्यू देते हैं। समारोहों—कार्यक्रमों में भी वे आखिरी कुर्सी पर ही बैठना पसंद करते हैं। राहुल गांधी ने जहां अपनी पढाई की है, उस केम्ब्रिज युनिवर्सिटी की 'वर्सिटी'मेग्जिन में 2011 में उन्होंने एक इंटरव्यू दिया था, जिसमें राहुल ने कहा था कि'मैं आज जो भी हूं, उसका श्रेय केम्ब्रिज को जाता है।'
आरती लिखती है कि'' राहुल गांधी की पहचान उनके हावभाव, आम जनता के बीच उनकी मौजूदगी और उनके आसपास काम करने वाले लोगों की राय पर से तय नहीं हो सकती। राहुल के साथ दिक्कत यह है कि वे अपने खुद के बारे में बहुत कम बात करते हैं। एक नेता के लिए यह एक गुण माना जा सकता है परंतु राहुल अभी लीडर बनने की दिशा में अग्रसर है, तब राहुल को 'डीकोड' करने के इच्छुक लोगों को यह एक समस्या लगती है।''

नईदिल्ली में जब 'डीकोडिंग राहुल गांधी' पुस्तक का विमोचन हुआ तब'ओपन'मेग्जिन के राजनीतिक संपादक हरतोषसिंह बाल ने कहा कि 'स्वभाव से राहुल गांधी एक शालीन व्यक्ति हैं, पर निर्णायक नहीं। राहुल गांधी जो जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे, उसके मुताबिक ही कांग्रेस की भावी दिशा तय होगी, पर राहुल एक ऐसे थ्रेशहोल्ड पर हैं, जहां से उन्हें या तो एकदम पीछे हट जाना चाहिए या एकदम आगे बढ जाना चाहिए।'

संतोष देसाई, जो समकालीन मुद्दों की मेनेजमेंट फिलॉसफी को तराशने के लिए मशहूर हैं,उनकी राय में'राहुल गांधी ने युवा कांग्रेस में अब तक जो काम किया है, वह एक मेनेजमेंट के रूप में और प्रोजेक्ट के रूप में किया है। राहुल कांग्रेस को एक नए फ्रेमवर्क में देखने के इच्छुक हैं और वही उनकी कडी परीक्षा है।' आरती रामचंद्रन ने विमोचन के अवसर पर कहा कि'राहुल का आर्थिक चिंतन लेफ्ट आफ द सेंटर है।मतलब यह कि सोनिया गांधी और मनमोहनसिंह के बीच का चिंतन है। राहुल की कुछ नया करने की इच्छा है परंतु वर्तमान स्थितियां उन्हें सोनिया या इंदिरा के पुराने रास्तों पर ले जा रही हैं।'

'द इकानॉमिस्ट'मेग्जिन ने आरती रामचंद्रन के इस निरीक्षण पर जो लेख प्रकाशित किया है, उसका शीर्षक है—'द राहुल प्रॉब्लम।' आरती का कहना है कि राहुल गांधी के उद्देश्य उम्दा हैं और आम आदमी खा तौर पर गरीबों के लिए हैं परंतु उनमें अभी ठोस योजनाओं का अभाव है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजयसिंह के अनुसार, राहुल गांधी निकट भविष्य में एक बडी भूमिका में नजर आएंगे। पिछले दिनों हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के बाद उनके सत्ता में जाने की संभावनाओं पर विराम लग गया है, इसलिए प्रबल संभावना यह है कि वे संगठन में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालें। पार्टी में उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनाए जाने की भी चर्चा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि जल्द ही राहुल गांधी राजनीति की मुख्य धारा में दाखिल हो जाएंगे।

'डीको​डिंग राहुल गांधी' में एक किस्सा है। 2010 में दिल्ली में एक विज्ञान मेले में राहुल गांधी ने शालेय छात्रों से कहा ​था कि बचपन में उन्हें भूत के कारण अंधेरे से डर लगता था। दादी (इंदिरा गांधी)ने एक बार कहा था कि अंधेरे में जाकर तो देखो! और, राहुल ने गार्डन के अंधेरे में चक्कर लगाया तो पता चला कि इसमें डर जैसी कोई बात नहीं है। राहलु गांधी के लिए शायद ऐसा ही और बेप्टिजम आफ फायर 2014 में आ रहा है और राहुल भी उसके लिए बडी संजीदगी से तैयार हैं। कांग्रेस ही नहीं, देश की आशा और उम्मीद राहुल गांधी पर टिकी हैं, लेकिन इतना तय है कि राहुल कांग्रेस और देश के लिए कुछ नया करने के इच्छुक हैं और जैसे—जैसे उनकी पकड मजबूत होती जाएगी, वैसे—वैसे यह साफ होता जाएगा कि आखिर राहुल गांधी करना क्या चाहते हैं।

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