शनिवार, 25 अगस्त 2012

जात न पूछो साधु की..

धूप-छांव
महाकवि कबीरदास जी ने कहा है ‘जात, न पूछो साधु की।’ हम भी नहीं पूछेंगे, मगर भगवा वस्त्र धारण करने पर यह सवाल तो उठता है कि यह बाबा आखिर है क्या? जो नतीजे अण्ण हजारे न दे सके, वह काम बाबा रामदेव ने कर दिखाया। अण्णा हजारे पहले तो भीड़ इकट्ठा करने में विफल रहे।

उसके बाद भीड़ तो इकट्ठा हुई जरूर, परंतु नौ दिनों के अनशन के बाद अरविंद केजरीवाल हांफने लगे। बलिदान की बात तो बहुत दूर रह गई और पूरा की पूरा आंदोलन ही बलि चढ़ गया। इससे सबक लेकर बाबा रामदेव ने अपने अनशन को बेमियादी बनाने के बजाय दिल्ली के रामलीला मैदान पर शार्ट टर्म ‘पोलिटिकल ड्रामा’ खेलकर परदा डाल दिया। ऐसे ड्रामों के लिए बहुत धन की जरूरत होती है और वह कतिपय भगवाधारी संन्यासियों के पास ही है।

बाबा रामदेव की सभा में हजारों लोगों के सैलाब को देख सरकार भी चिंता में पड़ गई थी, वहीं देश की प्रमुख विरोधी पार्टी भाजपा के साथ ही जनता दल (यु), समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी बाबा का समर्थन करतीं दिखीं। मंच पर देश की एक प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी-भाजपा के अध्यक्ष नितीन गडकरी और जनता दल (यू) के प्रमुख शरद यादव बाबा रामदेव के आजू-बाजू किसी चेले-चपाटी की माफिक सट गए थे। उनके साथ बाबा भी अभिभूत थे। अटलबिहारी वाजपेयी यदि आज भाजपा के अध्यक्ष होते तो यकीनन उन्होंने अपने पद की गरिमा कायम रखी होती, परंतु टीवी केमरे द्वारा दिखाई जा रही भीड़ को देख ये नेताद्वय ललचा गए। बाबा रामदेव जैसे ड्रामेबाज व्यक्ति की बगल में बैठने को लाचार होना पड़े, ऐसी परिस्थिति कभी राष्ट्रीय नेताओं  में देखने को नहीं मिली।

दूसरे शब्दों में कहें तो ‘भीड़’ लोकप्रियता का पैमाना है। नेताओं की भीड़ में ‘वोट बेंक’ दिखाई पड़ता है परंतु वास्तविकता यह है कि जंतर-मंतर हो या रामलीला मैदान, वहां इकट्ठा होने वाली हजारों की भीड़ इस देश के 125 करोड़ लोगों की नुमाइंदगी नहीं करती। यह भीड़ इस देश के करोड़ों किसानों, लाखों आदिवासियों, लाखों बुद्धिजीतिवयों और 25 करोड़ से अधिक अल्पसंख्यकों का प्रतिमिधित्व भी नहीं करती। मानवीय भीड़ तो ‘मेनेज’ की जाती है। भीड़ अब खरीदी जाती है। लोगों को मैदान पर लाने के लिए पानी के पाऊच से खाने के पैकेट वाऊचर भी देना पडते हैं। परिवहन निगम की बसों में मुफ्त में सवारी कराई जाती है। 

यदि कोई पार्टी सत्ता में होती है तो भीड़ इकट्ठा करने की जिम्मेदारी पुलिस, तहसीलदार, पटवारी, कलेक्टर ारीखे प्रशासनिक अधिकारियों तक को सौंप दी जाती है। बाबा रामदेव के पास अकूत संपत्ति होने से निजी या सरकारी बसों का काफिला खड़ा कर देते हैं। अण्णा हजारे के अनशन के वक्त बाबा रामदेव थोड़ी देर के लिए जाते हैं 5 हजार लोगों की भीड़ लक्जरी बसों नें बैठाकर ले जाते हैं और बाबा के जाने के बाद वह भीड़ गायब हो जाती है। यह भीड़ स्वयभू नहीं, बल्कि प्रोफेशनल होती है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, सवरेदय के जनक विनोबा भावे या महात्मा गांधी की सभा में जो भीड़ इकट्ठा होती थी, वह स्वयंभू होती थी, प्रोफेशनल नहीं होती थी। गांधीजी के अनशन के वक्त उनके सामने बैठे हजारों लोगों को भोजन या पानी नहीं दिया जाता था। गांधीजी अनशन पर हैं तो भीड़ भी अनशन पर होती थी। भोजन-पानी को त्याग देती थी।

दिल्ली के रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के ड्रामें को देख कांग्रेसनीत यूपीए सरकार भी डर गई थी। बाबा रामदेव ने दिल्ली में लागू धारा 144 का खुलेआम उल्लंघन किया, किंतु दिल्ली पुलिस सर्वोच्च न्यायालय के डर से कानून भंग करने वाले व्यक्ति के साथ जोड़-तोड़ ही करती ही दिखाई दी। बाबा रामदेव ने स्टेडियम पर उन्हें मिली अनुमति से भी अधिक घंटे तक आंदोलन कर अनुमति का उल्लंघन किया, किंतु केंद्रीय गृह मंत्रलय बाबा के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उनके हाथ-पैर ही जोड़ता रहा। केंद्र सरकार की इस लाचारी को देख बाबा रामदेव और उन्माद में आ गए। बाबा रामदेव, भले ही भगवा वस्त्र पहनते हों, काले धन पर और भ्रष्टाचार पर बड़ी-बड़ी बातें करते हों पर भीतर से वे एक डरपोक इंसान ही दिखाई पड़ते हों। इसके पहले के आंदोलन में दिल्ली पुलिस ने देर रात उनके आंदोलन पर लाठियां भांजी थीं, तब बाबा रामदेव महिला के कपड़े पहनकर चंपत हो गए थे। इस बार सरकार ने खुद पर काबू रखा तो बाबा बल्लियों उछलने लगे थे।

हकीकत में देखा जाए तो बाबा रामदेव महात्मा गांधी, वीर भगतसिंह या सरदार वल्लभभाई पटेल या शहीद चंद्रशेखर के दूर-दूर तक नहीं। गांधीजी, भगतसिंह या सरदार पटेल 200 करोड़ की कंपनियों के कभी मालिक नहीं रहे। स्काटलेंड के किसी टापू के मालिक भी नहीं रहे। नेपाल से आये बालकृष्ण जैसा कोई संदिग्ध व्यक्ति उनका चेला भी नहीं रहा। अण्णा हजारे और बाबा रामदेव में भी बहुत फर्क है, जमीन आसमान का कहें तो भी आश्चर्य नहीं होगा। गांधीजी या विनोबा भावे का कोई भी शिष्य आर्थिक अपराध के मामले में कभी जेल नहीं गया था। हकीकत में बाबा रामदेव साधु के वेष में एक बिजनेसमेन और राजनीतिक है। 

बाबा रामदेव ढोंगी साधु हैं, उन्होंने योग जैसी आदि कला का बाजारीकरण कर दिया और  मुफ्त मिलने वाली जड़ी-बूटी को अपनी दुकानों में सजाकर विक्रय की वस्तु बना दिया। उनके मुख से कभी किसी भगवान का नाम नहीं सुनाई दिया। उन्हें कभी मंदिर में जाते नहीं देखा गया। उनके मुख पर हमेशा या तो काला धन रहा या भ्रष्टाचार रहा और उन्होंने हमेशा सरकार को उखाड़ फेंकन की ही बात की। उनके इर्द-गिर्द जो राष्ट्रीय दलों के नेता चिपके थे, उससे उनके दलीय राजनीति भी उजागर हो गई है। वे किसी एक राजनीति दल या संगठन के एजेंट के रूप में उजागर हो गए हैं। वे ऐसे बोल रहे थे, जैसे किसी से उन्होंने कांग्रेस या यूपीए सरकार के खिलाफ सुपारी ली हो। नेताओं को बाबा रामदेव जैसे लोगों की जरूरत होती ही है। 

उनके आजू-बाजू जो नेता मीडिया में खुद को चमकाने के लिए जमा थे, उनमें मॉस अपील है क्या? शरद यादव की ही बात करें तो मूलत: जबलपुर(मप्र) के हैं, लेकिन चुनाव लड़ते हैं बिहार से। गडकरी को भी आप मॉस लीडर इसलिए नहीं कह सकते, क्योंकि वे अब तक दूसरे दरवाजे यानी विधान परिषद से विधायक और मंत्री बने हैं। उन्होंने अब तक विधानसभा या लोकसभा का चुनाव तक नहीं लड़ा है। ऐसे नेताओं और पार्टियों को हमेशा एक मोहरे की जरूरत होती है और बाबा रामदेव वही कर रहे हैं। बाबा रामदेव को यह नहीं भूलना चाहिए कि मंच पर बैठे नेताओं ने पहले अण्णा की तारीफ में कसीदे काढ़े थे और अण्णा का आंदोलन फ्लॉप हो जाने की स्थिति में इन लोगों ने बाबा का दामन थाम लिया था।

मुङो तो लगता है कि बाबा यूपीए और एनडीए-दोनों के साथ खेल रहे हैं। अभी उन्होंने मंच पर एनडीए के नेताओं को बैठाकर कांग्रेस को डराया है। बाबा रामदेव चाहते हैं कि उनके खिलाफ चल रही और चलने वाली आयकर विभाग और फेरा के मामलों की फाईल बंद हो जाए। बाबा ने अनशन समाप्त करने से पहले एक संकेतक वाक्य कहा है। बाबा ने कहा-‘अब अनशन आंदोलन नहीं, 2014 में किसे वोट देना है, यह घोषणा बाद में करूंगा।’असल में, बाबा रामदेव आंदोलन, अनशन कर शक्ति प्रदर्शन के साथ केंद्र सरकार के साथ कोई ‘डील’ करना चाहते हैं। 

भाजपा और एनडीए के नेता भी यह समझ चुके हैं कि जिस दिन कांग्रेस बाबा रामदेव के साथ यह ‘डील’ कर लेगी, उस दिन बाबा को भाजपा या एनडीए को भी छिटकने में देर नहीं लगेगी। बाबा की मुहीम भ्रष्टाचार के खिलाफ है, यह अच्छी बात है, लेकिन उन्हें कर्नाटक में येद्दियुरप्पा का भ्रष्टाचार नहीं दिखता। बिहार जैसे राज्य में लोकायुक्त क्यों नहीं चुने जाते, उस पर बाबा चुप्पी साध लेते हैं। अपनी ही कंपनी पर लगे आरोपों में उन्हें भ्रष्टाचार नहीं दिखता। मायावती और मुलायम सिंह के समर्थन से बाबा सहमत होते हैं तो और आश् चर्य होता है, हंसी आती है क्योंकि इन दोनों पर भ्रष्टाचार के मामलों में जांच चल रही है। कहा जाता है जिसका दोस्त बाबा रामदेव है, उसे दुश्मन ढूंढने की जरूरत नहीं।

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