शनिवार, 18 अगस्त 2012

असम क्यों है ‘अ सम?’

केंद्रीय गृहमंत्री बनने के बाद सुशीलकुमार शिंदे को वाकई लग रहा होगा कि उन्होंने कांटों का ताज पहन लिया है। आतंकवाद, माओवाद जैसी चिरकाल से चली आ रही विहंग समस्याएं तो उन्हें निवृत्त गृहमंत्री चिदम्बरम विरासत में दे ही गए थे कि उनके गृहमंत्री बनते ही उत्तर-पूर्व में स्थित असम सुलग उठा। ठीक इसी बीच पुणो में हुए सीरियल बम ब्लास्ट ने नए गृहमंत्री का धमाकेदार इस्तकबाल किया।


असम की हिंसा अभी थमी भी नहीं थी कि असम के चक्कर में देश की मायानगरी मुंबई में भी बवाल मच गया। पहले असम की बात, जहां जारी हिंसा में अब तक 75 से अधिक लोग मौत के मुंह में समा गए हैं। इसके अलावा 70 हजार लोगों को शरणार्थी शिविरों की शरण लेनी पड़ी है। यही नहीं 4 लाख से अधिक लोग बेघर हो गए हैं। असम के ये दंगे ब्रrापुत्र घाटी में स्थित गांवों में बसे बोडो आदिवासी समुदाय और वहां की मुस्लिम बस्तियों के बीच उपजे तनाव की वजह से हैं और उन्हें नियंत्रित करना शहरी दंगों की बनिस्बत बेहद मुश्किल और जटिल है। 

दंगाग्रस्त इलाकों का भौगोलिक स्वरूप ही ऐसा है कि असम ही नहीं समूचे उत्तर-पूर्वीय राज्यों का संपर्क शेष भारत से कट गया है। असम के बारे में जानकारी रखने वाले लोग भली-भांति जानते हैं कि राज्य में 60 के दशक के अंतिम वर्षो में और 70 के दशक की शुरुआत में बाहरी लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। भारत ने उस दौर में पाकिस्तान से 1965 और 1971 में दो युद्ध लड़े थे। 1971 के युद्ध के दौरान बांग्लादेश निर्माण के बाद बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों ने पलायन किया, जिन्हें बांग्लादेश की सरहद पर स्थित जिलों में रखा गया था। डूब्रि सहित एक समय के गोलपारा जिले और समीप के पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय के जिलों में इन बांग्लादेशी विस्थापितों को रखा गया था।

बांग्लादेश निर्माण के बाद ज्यादातर बांग्लादेशी वापस वतन लौट गए, परंतु अनेक लोगों ने जाना पसंद नहीं किया। आज भी भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा का उचित बंदोबस्त नहीं है। जटिल भौगोलिक स्थिति के कारण कंटीले तारों की बाड़ भी नहीं लगाई जा सकी है। असम, अपने नाम के अनुरूप ही अ सम है। इस राज्य में अनेक नदी-नाले हैं, इस कारण सीमा पर बाड़ लगाना और निगरानी चौकी बनाना मुश्किल है। इजराइल की माफिक हमारी सरहद की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीक इस्तेमाल की जाए, तो बात बनेगी, अन्यथा यह समस्या हमेशा मुंह बाए खड़ी रहेगी और ईशान भारत में गैर-कानूनी बस्तियां बसती ही रहेंगी। 

जानकारों ने संकेत दिए हैं कि यदि 2011 की धर्मवार जनगणना के आंकड़े जाहिर किए जाएं, तो असम के 27 जिलों में से 11 मुस्लिम बाहुल्य जिले होने की बात सामने आएगी। हिंदू बोडो और मुस्लिम पर-प्रांतीय के बीच अनुवांशिक अड़चनों के लिए असम में गैर-कानूनी रूप से हो रही घुसपैठ को सीधा जिम्मेदार माना जा सकता है। 1971 के पश्चात बसी इन गैर कानूनी बस्तियों ने स्थानीय और जिला स्तर पर  प्रशासनिक तंत्र के साथ सांठगांठ कर सरकारी और चरणोई की भूमि हथिया ली। आज भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित अधिकांश जिलों में सरकारी या चरणोई की जमीन देखने को नहीं मिलती, जो एक समय स्थानीय लोगों और किसानों के लिए समान थी।

स्थानीय राजनेताओं और खासतौर पर बोडोलैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्टर्ड डिस्ट्रिक्ट (बीडीएटी) के लोगों द्वारा व्यक्त की गई चिंता को राज्य और केंद्र सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए और उसकी जांच करानी चाहिए। भारत के संविधान के छठे परिशिष्ट के अंतर्गत बीडीएटी इलाके में प्रशासन किया जाता है।  हाल की हिंसा को लेकर दिल्ली में दिए गए धरने में बोडोलैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्टर्ड डिस्ट्रिक्ट (बीडीएटी) को रद्द करने की मांग की गई है। इस मांग के औचित्य और अनौचित्य पर बहस होती रहेगी, परंतु इस बात में कोई शक-शुबहा नहीं कि पिछले अनेक सालों से बोडो और मुस्लिम समुदायों के बीच पैदा होने वाले तनाव  के मूल में एक बात यह भी है। 

अपने लिए एक स्वायत्त राज्य की मांग के लिए हिंसक हुए बोडो समुदाय को राज्य और केंद्र सरकार के साथ त्रिपक्षीय समझौते के बाद जब बीडीएटी बनाने का अवसर मिला था, तो इस भू-भाग में रहने वाले दूसरे समुदाय के लोग अपने-आप दूसरे दज्रे के नागरिक हो गए। इससे पुलिस या प्रशासन कोई भी तनाव या बवाल मचने की स्थिति में पहले बोडो समुदाय की चिंता करता है। यह वाकई गंभीर और चिंताजनक बात है। ऐसे में असम सरकार के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह शांति स्थापित होने के बाद सभी पक्षों के साथ बैठकर तनाव का हल निकाले। अगस्त 2008 में उत्तर असम के ऊदलगुडी और बरांग जिले में हुए दंगों से तरुण गोगोई और उनकी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया। उस वक्त भी दंगों का स्वरूप बोडो विरुद्ध मुस्लिम ही था। 

जबकि दंगों की जांच के लिए गठित जस्टिस कूकन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, इसकी शुरुआत एक मुस्लिम छात्र संगठन द्वारा जबरदस्ती कराए गए बंद से हुई थी। इस बार स्थिति उलट है। कोकराजर जिले में पहले 6 जुलाई को और बाद में 19 जुलाई को दो-दो मुस्लिम युवकों की हत्या हुई। इसके जवाब में 20 जुलाई को बोडो लिबरेशन टाईगर्स के चार पूर्व सदस्यों को पुलिस स्टेशन के नजदीक घेरकर उनकी हत्या कर दी गई थी। बीडीएटी बनने के बाद बोडो समुदाय के लोग अपने वर्चस्व के जिलों में रहने वाले मुसलमानों को बांग्लादेशी मानते हैं। बोडो लोगों ने दक्षिण असम के कोकराजार के पास आंदोलन उभारा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि युनाईटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के कार्यकर्ता पंजाब के खालिस्तानी  या कश्मीर घाटी के उग्रवादियों के नक्शेकदम पर हैं। उन पर आजाद असम का जुनून सवार है।

उल्फा के सदस्य टैक्स वसूलते हैं और गैर असमी धनाढ्यों की हत्या करते हैं। विदेशी नागरिकों को असम से बाहर खदेड़ने की समस्या का हल आज तक अधर में है। असम का तेल (क्रूड) असम के स्वामित्व का है, यह नारा देकर असम स्टुडेंट्स यूनियन (आसू) का अनुसरण कर उल्फा ने आज तमाम गैर असमियों को असम छोड़ने की चेतावनी दे दी है। उल्फा अब तक अनेक उद्योगपतियों को मौत के घाट उतार चुका है। हत्या के पहले उद्योगपतियों से मोटी रकम मांगी जाती है। अब उल्फा पर प्रतिबंध की मांग उठ रही है। चाय के बगीचों के इलाके इतने विशाल है कि वहां बंदोबस्त करना मुश्किल है। तरुण गोगोई और उनकी सरकार लचर है। गोगोई के मुख्यमंत्री बनने के बाद से प्रशासन, कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी है। मौजूदा उल्फा के सदस्य पहले असम गण परिषद (एजीपी) के और ऑल असम स्टुडेंट्स यूनियन (आसू) के सदस्य थे।

उल्फा को जनता के अधिकांश भाग का समर्थन है। असम की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। उल्फा वहां समानांतर सरकार चला रही है। स्वतंत्र बोडोलैंड आंदोलन चला रहे नेताओं का कहना है कि पिछले 60 सालों में केंद्र सरकार ने असम के विकास के लिए कुछ नहीं किया। इससे चिढ़े कुछ विचारवान युवाओं ने आंदोलन छेड़ा है। आंदोलन के बाद असम को एक रिफायनरी मिली थी। उल्फा नेताओं की मांग असम को स्वतंत्र राज्य बनाने की है। उल्फा की कामयाबी का राज समझाते हुए एक नेता ने कहा कि बेरोजगारी, असम की मुख्य समस्या है। 

उल्फा रईसों से धन-वसूली करने के बाद सड़क और पुल बनाता है और गरीबों को काम देता है, लेकिन मेरी सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं है। उग्रवादी अब तक सुरेंद्र पॉल सहित 100 हत्याओं को अंजाम दे चुके हैं। ऐसे हालात में असम की समस्या विषम होकर दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इस कारण जंगल, चरणोई के मैदान और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों को छिनने के चक्कर में टकराव और तीक्ष्ण और कर्कश हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। एक तरफ आबादी बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ प्राकृतिक संसाधन घट रहे हैं। जाहिर है गृहमंत्री शिंदे सहित यूपीए सरकार के लिए चुनौतियों से निपटना आसान नहीं है।























3 टिप्‍पणियां:

  1. article me likhi hui chhoti par is shandar si heading ne asam ke hinsa ko spasht kar diya hai.. heading pdhne k sath hi sara mamla hum sare mamle se introduce ho jate hai.......

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  2. article me likhi hui chhoti par is shandar si heading ne asam ke hinsa ko spasht kar diya hai.. heading pdhne k sath hi sara mamla hum sare mamle se introduce ho jate hai.......
    from--- kislay gaurav

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  3. article me likhi hui chhoti par is shandar si heading ne asam ke hinsa ko spasht kar diya hai.. heading pdhne k sath hi sara mamla hum sare mamle se introduce ho jate hai.......

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